गुरुवार 28 मई 2026 - 14:36
ईद उल अज़हा नफ़्स पर ग़लबा पाने और हक़ीक़त ए ग़दीर को समझने का दिन है। हुज्जतुल इस्लाम हुसैनी

हौज़ा / ज़ंजान में ईदुल अज़हा के जलसे से ख़िताब करते हुए नुमाइंदा-ए-वली-ए-फ़क़ीह ज़ंजान ने कहा कि ईद-ए-क़ुरबान इंसान को नफ़सानी ख़्वाहिशात से निजात और ईद ए ग़दीर की हक़ीक़त को समझने का सबक़ देती है जबकि उम्मत-ए-मुस्लिमा की ताक़त इत्तिहाद और वहदत में पोशीदा है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , ज़ंजान में नमाज़-ए-ईद-उल-अज़हा के ख़ुत्बा देते हुए हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लिमीन सैय्यद मुस्तफ़ा हुसैनी ने ईद-ए-क़ुर्बान को इख़्लास, बंदगी और ईसार की अज़ीम अलामत करार दिया। उन्होंने कहा कि जिस तरह हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अल्लाह की रज़ा के लिए अपनी सबसे प्यारी चीज़ क़ुरबान करने का जज़्बा दिखाया, आज भी इंसान को अपने नफ़्स के इस्माईल को क़ुर्बान करने की ज़रूरत है।

उन्होंने मनसब परस्ती, तकब्बुर और माल व दौलत की बेजा मुहब्बत को रूहानी तरक़्की की राह में रुकावट करार देते हुए कहा कि हक़ीक़ी कामयाबी उसी वक़्त मुमकिन है जब इंसान अपनी नफ़सानी ख़्वाहिशात पर क़ाबू पा ले।

इमाम ए जुमा ज़ंजान ने हज के अज़ीम इज्तिमा को उम्मत-ए-मुस्लिमा के इत्तिहाद की रौशन अलामत करार देते हुए कहा कि मुख़्तलिफ़ ज़बानों और नसलों से ताल्लुक रखने वाले मुसलमानों का एक मरकज़ पर जमा होना इस हक़ीक़त को वाज़ेह करता है कि इस्लामी दुनिया की इज़्ज़त व ताक़त वहदत के साये में ही हासिल की जा सकती है।

उन्होंने ताकीद की कि जब तक मुस्लिम माशरे तफ़रक़े से दूर होकर तौहीद के मेहवर पर मुत्तहिद नहीं होंगे, तब तक इस्लाम दुश्मन ताक़तों के मुक़ाबले में मतलूबा ताक़त पैदा नहीं की जा सकती।

उन्होंने ईदुल-अज़हा और ईद-ए-ग़दीर के दरमियान गहरे ताल्लुक की तरफ इशारा करते हुए कहा कि ईदुल-अज़हा बंदगी और तस्लीम व रज़ा की आज़माइश है, जबकि ईद-ए-ग़दीर इसी बंदगी के कमाल और विलायत-ए-इलाही के एलान का दिन है।

हुज्जतुल इस्लाम वल-मुस्लिमीन हुसैनी ने कहा कि वली-ए-ख़ुदा से वाबस्तगी के बग़ैर इबादात महज़ बे-रूह ज़ाहिरी आमाल बनकर रह जाती हैं।

उन्होंने मिल्लत-ए-ईरान की इस्तिक़ामत और मुक़ावमती जज़्बे को तौहीदी अक़ाइद का नतीजा करार देते हुए कहा कि शोहदा की क़ुरबानियाँ मिल्लत के हौसले को कमज़ोर नहीं करतीं, बल्कि ज़ुल्म व इस्तिकबार के ख़िलाफ़ जद्दोजहद के अज़्म को मज़ीद मज़बूत बनाती हैं।

उन्होंने मौजूदा हालात में रहबर-ए-मुअज़्ज़म-ए-इंकिलाब-ए-इस्लामी की हिदायात पर मुकम्मल अमल की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए कहा कि बाहमी हमदर्दी, तआवुन, सादगी और इस्लामी तर्ज़-ए-ज़िंदगी को फ़रोग़ देकर क़ौम हर मुश्किल मरहले से कामयाबी के साथ गुज़र सकती है।

उन्होंने कहा कि जिस तरह ईमान और इत्तिहाद के ज़रिए माज़ी में अज़ीम कामयाबियाँ हासिल की गईं, उसी तरह आज भी इल्मी, सक़ाफ़ती और सामाजी मैदानों में नई कामयाबियाँ हासिल की जा सकती हैं।

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